Friday, December 7, 2012

एक सन्देश !!



गिरते, गिरते, चलना सिखा,
रोते रीते, हँसना |
ज़िन्दगी की सफ़र आसां नहीं हैं,
पर हर किसी को हैं, बसना |

आंगनों का सिकुड़ना जारी हैं,
लोगों का बिछुड़ना जारी हैं,
अल्फत की इस दुनिया हैं,
परिवार चलाना भारी हैं |

इस भीड़-भाड़ सुनहरी दुनिया में,
सब तरफ तन्हाई छा रही हैं |
वैश्विकता की मादकता में,
अपनों की भुलाई जा रही हैं |

भविष्य एक बार फिर,
भूत का दिशा ले रही हैं,
हमें हर बार खुद से जुड़ जाने का,
सन्देश दे रही हैं |


हमारा वर्तमान आज भविष्य और भूत के जाल में फँस गया हैं | हम आज वास्तविकता और दूरदर्शिता से परे हो, सिर्फ भावुकता और भौतिकता तक ही सिमित हो गए हैं |

मेरे इस कविता के प्रेरणा हैं- श्री सुशील बाजपाई, इनके बारे में जितना भी बोला या लिखा जाय कम ही होगा !! Engineering हो या Medical, social science हो या politics, कुछ भी इनसे परे नहीं हैं | हर मुश्किल का हल हैं इनके पास हैं और *हर हल मुश्किल !!


Friday, October 19, 2012

गली क्रिकेट


चलो आज फिर,
एक बार क्रिकेट खेल आते हैं |
दोपहर की तपिश में,
खुद को सचिन बनाते हैं |
डेल्हा की तंग गलियों में,
जोर-जोर से चिल्लाते हैं |
प्लास्टिक की गेंद से,
गलियों को गनगनाते हैं |
इसी बहाने गन्दी नालियों को,
थोडा साफ कर जाते हैं |
ईट का विकेट लगा,
गली में थोडा जाम लगाते हैं |
बार-बार गेंद मांग,
पड़ोसियों को जगाते हैं |
मम्मी के डाट- फटकार को
अनसुना कर जाते हैं |
जिंदगी के इस खूबसूरत पन्ने को,
एक बार फिर से पलट कर आते हैं |
चलो आज फिर,
एक बार क्रिकेट खेल आते हैं |

Sunday, July 15, 2012

देशी मुर्गी विलायती बोल


कुछ दिन पहले तथाकथित दिल वालों की दिल्ली शहर में एक Indian Art and Craft exhibition में भाग लेने आया था | गुप्तकाशी से नईदिल्ली की २० घंटो की बेवक्त,थकावट भरी और खतरनाक रोमांचकारी बस यात्रा ने मेरे अंदर के डर को और भी निडर कर दिया हैं| गुप्तकाशी और आस-पास के इलाके में हों रही लगातार मूसलाधार बारिश ने पहाड़ की सड़कों की गुणवता का जमकर परीक्षा लिया, नतीज़न जगह-जगह सड़कें अपनी गुणवता का फटेहाल प्रदर्शन कर रही थीं और उसका खामियाजा हमारे जैसे आम आदमी अपना समय और सुरक्षा गवां कर भर रहें थें|Disaster Management के बारे में सुन-सुन कर पक चूका हूँ, लेकिन यथार्थ में इसका कहीं भी सही क्रियान्वयन नहीं देख पाया हूँ | चाहे वो उत्तर बिहार का बाढ़ हों या बुंदेलखंड का अकाल ये सब आपदाओं में हर बार एक ही मुद्दा उठता/उठाया जाता हैं और वो मुद्दा होता हैं की इन प्राकृतिक आपदाओं में कितने लोग मारे गये और उस इलाके में राहत के लिए सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं ने क्या और कितना काम किया? दुनिया में प्राकृतिक आपदाओं से जितनी मौत होती हैं उसका ८०% मौत सिर्फ Asia Pacific में होती हैं; Asia Pacific में भी प्राकृतिक आपदाओं से जितनी मौत होती हैं उसका लगभग ६०%-७०% सिर्फ भारतीय महाद्वीप में होती हैं | Disaster Management अर्थात आपदा प्रबंधन कोई नया चीज या चमत्कार नहीं हैं, हम भारतीय सदियों पहले से इसका कुशल प्रबंधन करते आ रहें हैं, पिछले कुछ शतको से इस क्षेत्र में हमारा कुशल प्रबंधन लगातार रसातल में जा रहा हैं, मुश्किलें बढती हीं जा रही हैं, आजकल इसको अंग्रेजी नाम देके इस तरह से प्रायोजित किया जा रहा हैं जैसे की ये कोई नया अवतार/अन्वेषण हों गया हों |Organic Agriculture  अर्थात जैविक खेती के साथ भी यहीं विडंबना जुडा हुआ हैं, इसको भी इसी तरह से पूरा मसाला लगा कर इसका स्वाद बदल कर पेश किया जा रहा हैं और जब आमिर खान जैसे लोग इसके बारे में बोल दे तब तो ..............कुछ दिन पहले जैविक खेती के बारे में जागरूकता कार्यक्रम में मैं उत्तराखंड के कार्यक्षेत्र में था , कार्यक्रम समाप्त होने के बाद मैं एक अधेड उम्र की महिला से इस कार्यक्रम के फायदे और जैविक खेती के बारे मैं बातचीत कर रहा था, बातचीत के दौरान उस महिला ने बताया “सर जी हम लोग तो हमेशा से यहीं और इसी तरह से खेती किया करते हैं , यहाँ तक की हम लोग गाय और बैल भी इसीलिए पालते हैं ताकि उनसे गोबर मिल सके, आपलोग बस हमारे पारंपरिक खेती को ही नए अंग्रेजी नाम दे कर ले आये हैं और हमे बता रहें हैं , कम्पोस्ट का उपयोग करें, रासायनिक खाद का प्रयोग न करे “|आजकल हमारे देश मैं भी बहुत सारे foreign डिग्री धारी आ रहें हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कैसे करे, इसका पाठ हमें पढ़ा रहें हैं, ये भी एक गजब विडंबना हैं की  जिन्होंने खुद कभी गाँव देखा ही नहीं वो अब गाँव वालों के लिए policy बना रहें हैं , खैर छोडिये वापस अपने विषय पर चलते हैं |
                               Disaster Management और Organic Agriculture के बारे मैं जागरूकता और प्रचार बहुत जरुरी हैं लेकिन इसको नए तरीके और नए नाम से प्रायोजित करने का कोई जरुरत नहीं हैं, हम धीरे-धीरे पुनः “Green economy (Green economy फिर से हमारी पुरानी व्यवस्था का नया UN,US वाला अंग्रेजी वाला Brand name हैं, जिसका सीधा-सादा मतलब हैं, ऐसे व्यवस्था विकसित करना जिसमे हम प्रकृति की तरह हर product ya sub product का उपयोग कर सके अर्थात no wastage”
                       मेरे समझ से Disaster Management अर्थात आपदा प्रबंधन आपदायों का पूर्वानुमान हैं और इस पूर्वानुमान के आधार पर जान-माल के क्षति को कम से कम करने की कार्यविधि का समुचित क्रियान्वयन हैं |लेकिन हम भारतीयों की मानसिकता की “किसी भी सामान को तब तक चलाते जब तक की वो चूं न बोल दे , एकबार चूं तो बोले उसके बाद देखा जायेगा” ही इसके राह में सबसे बड़ा रोड़ा हैं, हद तो तब हों जाती हैं जब हमारी ये मानसिकता अपने खुद के शरीर के साथ भी यहीं व्यवहार करती हैं |उत्तराखंड में हर साल बरसात के मौसम में भूस्खलन होता हैं, हर बार सड़के टूटती हैं, हर बार लोग मरते हैं, सरकार ने भूस्खलन का क्षेत्र भी पहचान करके रखा हैं , भूस्खलन के बाद मलवा हटाने का भी बुरा ही सही पर व्यवस्था हैं परन्तु.... भूस्खलन को होने से पहले ही रोकने का कोई इंतजाम नहीं हैं |मान लिया जाये ये काफी महंगा प्रोजेक्ट हों सकता हैं किन्तु अगर आपने एक बार ये काम कर लिया तो आपका सालों का समय बच जायेगा , जो पैसे आप दस सालों में आपदा के बाद खर्चा करेंगे आप एक बार उसको आपदा के पहले ही उसको रोकने के लिए खर्चा कर दे |उत्तराखंड की सीमा चीन से जुडी हुए हैं , सीमा सुरक्षा के लिए तैनात जवानों के लिए खाद्य और आयुध सामग्री इसी वन-वे महामार्ग (मैं गुप्त-काशी के आस-पास के इलाके की बात कर रहा हूँ) से हों कर जाती हैं | खुदा न खास्ते कल अगर चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया तो हम लोग अपने ही देश में मलवा हटाते रह जायेंगे और विदेशी अंदर तक बिल्कुल आराम से आ जायेंगे | उत्तराखंड में बांध बनना चाहिए या नहीं इस मुद्दे पर दोनों पक्षों का जगह-जगह पर आंदोलन और मारपीट चल रहा हैं; केंद्र सरकार, राज्य सरकार, मंत्री, संत्री, साधू-सन्यासी सब भाषणबाज़ी मैं लगे हैं |विकास और पर्यावरण के नाम पर हर कोई अपने ego और वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहा हैं |क्या स्थानीय सरकार, राज्य सरकार, केंद्र सरकार और आम आदमी इन  मुद्दे पर गंभीरता से सोच कर कुछ दूरदर्शिता और समझदारी भरा कदम उठा सकते हैं?

Monday, July 2, 2012

यारों चलो !!


जिंदगी का सफ़र बढ़ाते चलो,
मंजिलो के पास आते चलो |
अफ़सोस,पश्चाताप के भंवर से निकल,
जूनून के गीत गुनगुनाते चलो !!

बादलों के गर्जन का इतबार करो ,
तेज हवाओं के रुकने का न इंतज़ार करो,
मंजिल तुझे बुला रही हैं,
हर मोड़ पे दीप जला रही हैं !|

सृष्टि के इस अनुपम उपहार को उपयोग दो,
खुद के खुदी के लिए इसको झोंक दो !!

Sunday, May 13, 2012

एक डूबकी


आज फिर ,
एक बार डूबकी लगा रहा हूँ ,
अशांत समुंद्र के सबसे शांत स्थल में जा रहा हूँ  |

माँ ,
इधर-उधर दौड-भाग कर,
आज फिर से बहुत कुछ बना रही हैं ,
आलू दम और खीर की खुश्बू से,
बेटे को बुला रही हैं |

गरमागरम खाने से थाली सजा रही हैं ,
बडे प्यार से मुझे बुला रही हैं ,
अपने आखों के सामने बैठाकर,
कौर कौर खिला रही हैं |

पुरे घर का हाल सुना रही हैं ,
भैया के बारे में बता रही हैं ,
दादा की मुश्किलें समझा रही हैं ,
पर अपने बारे में आज भी कुछ नहीं बतला रही हैं |

पतलेपन का ओह्लाना सुना ,
ज्यादा से ज्यादा खिला रही हैं |
दूसरों से सुना मेरा बड़ाई सुना रही हैं ,
कितने प्यार से पढाई का महत्व समझा रही हैं |

खाने के बाद हाथ धुला रही हैं ,
बिस्तरा पे बैठ , पीठ थपथापके
मुझे सुला रही हैं |
उसके बाद मेरे जुठे बर्तन मैं खाके ,
कपडे धुला रही हैं |

माँ ,
तू इतना काम ,
कैसे और क्यों करती जा रही हैं ?


कुछ दिनों पहले एक समाचार पत्र में , “माँ के नाम पैगाम” अंक के लिए मैंने अपना एक कविता प्रकाशित होने के लिए ई-मेल से भेजा था , कुछ देर बाद ही वहाँ से एक उत्तर आया , कृपया अपने माँ के साथ अपना एक फोटो भेजे | ये मेरे लिए तो अजीब परन्तु दुनिया के लिए काफी relevant और छोटा सा मांग था , परन्तु मेरे पास तो माँ का कोई कागज का फोटो हैं ही नहीं ,जो मैं इस दुनिया को दिखा सकू |दूसरी या तीसरी कक्षा में माँ ने भैया को बोल कर पहली बार मेरा फोटो खिंचवाया था वो भी अकेले का, आज तो स्थिति ऐसे हैं की वो करते हुए भी फोटो लिया जा रहा हैं| पर जहाँ तक माँ का सवाल हैं , हाँ वो तो  हमेशा मेरे दिल में हैं , मेरे शरीर का रोम रोम उस माँ का अहसानमंद हैं | मदर्स-डे पर अपनी माँ के संघर्ष और उनके साथ की कुछ बाते को मैंने शब्दों में उतारा हैं -

ममता के नाजुक पंखो से ,
बबंडर उडाया आपने |
गरीबी और बेचारी के काँटों से ,
गुलदस्ता बनाया आपने |
बबूल के छाव में भी,
आम का पौधा उगाया आपने |
जिंदगी के डगर पर हमें,
चलना सिखाया आपने |
हमें, हर मुश्किलों से ,
लड़ना सिखाया आपने |

Sunday, February 19, 2012

रेल गाड़ी आज भी छूक छूक करके चलती है !!

कुछ दिनों पहले यहीं चंदनापुरी के पास के गाँव मैं गया था , एक मेला देखने | इस मेले में भी सब कुछ वैसा ही था ; पारंपरिक मेले जैसा हीं , मेले के बाहरी हिस्से में वाहनों का पड़ाव क्षेत्र जहाँ  ट्रेक्टर ,बैलगाडियां और दो पहिया वाहन भरे पड़े थे , गाड़ियों पर या उसके आस-पास कुछ लोग विश्राम भी कर रहें थे |मेला का मध्य क्षेत्र में चलते-फिरते, रुकते लोगों का जबरदस्त भीड़ था |मेले में मिठाइयों , बच्चो के खिलौनों और औरतोँ के साज-सज्जा के स्टाल्स ही ज्यादा थे | औरतों (अधेड और व्यसक ) मंदिरों में पूजा के लिए कतारों में खड़ी थे | नवविवाहितों और किशोरियों का हुजूम साज-सज्जा के स्टाल्स पर व्यस्त था | बच्चों के साथ वाला परिवार खिलौनों और खाने में लगा हुआ था और हमारे जैसे नवयुवक मेला के चारो तरफ फेरा लगा रहें थे |मेले के दूसरे किनारे पे चरखा और बच्चो के मनोरंजन वाले बहुत सारे मशीने चल रही थीं | वहाँ एक रेल-गाड़ी के प्रतिरूप वाला भी मशीन था , जो की सिटी बजाते हुए छूक-छूक कर के गोल-गोल घूम रही थी और उस पर चढ़ने के लिए भी लाइन लगी थी | सबसे दिलचस्प और असरदार बात ये थी की बच्चें उस प्रतिरूपी रेल-गाड़ी से उतरने  के बाद भी छूक-छूक रेलगाड़ी करते हुए आपस में खेल रहें थे |कुछ दिन पहले जब में जागृति यात्रा में गया था , जहाँ की भारत के सर्वोत्तम विश्वविधालयों में अध्यनरत इस देश के भावी पीढ़ी ,देश के कोने-कोने से आये हुए थे पर वो लोग भी इस छूक-छूक रेलगाड़ी का खेला खेलके गोल-गोल घूम कर नाचना नहीं भूले थे  | 
                   
आजकल के ट्रेने या तो इलेक्ट्रिक या डीजल इंजनों पर चलती और इन ट्रेनों में बैठ कर मैं अक्सर दूर-दूर तक की यात्रा करता हूँ पर आज तक न तो मैंने वो  छूक-छूक की आवाज़ सुनी हैं और न हीं कर्ण प्रिय वो सिटी , हाँ कान फाड़ने वाला हार्न अक्सर सुनाई पड़ता हैं | आजकल तो हर जगह मेट्रो की मांग हैं ,कहीं कहीं तो ये चुनाव का मुद्दा भी बन रहा हैं ; दिल्ली में ये काफी सफल और लोकप्रिय भी हैं और बैठने में मज़ा भी आता हैं पर मैंने इससे भी कभी  छूक-छूक की आवाज़ नहीं सुनी | अपने बचपन मैं, मैंने गया स्टेशन मैं १-२ बार इस छूक-छूक करती ट्रेन को देखा था और सुना था |उसके बाद से तो ये सिर्फ दार्जिलिंग और शिमला जैसे पहाड़ी पर्यटक स्थलों का दिखावा बन कर रहा गया हैं | गौर करने लायक बात ये हैं की ऐसा क्या हैं इस छूक छूक रेल गाड़ी में , जो की अपना अस्तित्व खोने के बाद भी भारत के हर वर्ग और हर पीढ़ी में खुद को जिन्दा रखे हुए हैं |
मैं एक ऐसे युवा पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहा हूँ , जो की पश्चिमी सभ्यता में खुद को डुबो देना चाहता हैं , ब्रान्ड के दिखावे ने हम सबको को अंधा बना दिया हैं और डिस्को की तेज आवाजों ने बहरा |मेरा हमेशा से मानना रहा हैं , नयी बातें और गुर सीखना जरुरी भी हैं और अच्छा भी पर अपनी परम्परा और पुरानी अच्छी बातों को भुलाकर नहीं | कुछ दिनों पहले जब मैं अपने जर्मन मित्र से इसी मुद्दे पर बात कर रहा था उसने एक बहुत अच्छी बात बताई की ये हम मनुष्यों का नैसर्गिक स्वाभाव हैं की हमारी आँखें हमेशा दूसरे चीजों की तरफ देखती हैं और चकाचौंध उसे हमेशा आकर्षित करता हैं , अगर भारतीय इस चकाचौंध से आवेशित हों रहें हैं तो ये कोई अजूबा नहीं हैं ; पर ये चकाचौंध एक दिवास्वप्न की तरह ही हैं और हम पश्चिमी देश इस दिवास्वप्न से निकलने के लिए भारत की तरफ देख रहें हैं |”  
                          हम भारतीय  अपने  परम्परा और संस्कृति पर खुद को बहुत गौरवान्वित महसूस करते हैं पर आज इस परम्परा और संस्कृति का अस्तित्व ही दाव पर लगा हुआ हैं और इस अस्तित्व की लड़ाई में इसका साख बचाने में वों लोग लगे हुए हैं जो सिर्फ पारंपरिक और सांस्कृतिक होने का दिखावा कर रहें हैं | मैंने जिस कॉलेज से इंजिनियरिंग किया हैं , वो तो वैसे बंगाल के श्रेष्ठ कॉलेजों में से एक हैं पर यहाँ पर ग्रामीण इलाकों से बहुत छात्र आते हैं ,जिन्होंने बचपन से पढाई के अलावा वो सब नहीं किया जो की हमारे शहरी मित्रगण अक्सर करते हैं !! इनमें से कईयों को Valentine Day के बारे में पता नहीं होता हैं |जब उनके दोस्तों और seniors को पता चलता हैं की वो  Valentine Day के बारे में नहीं जानता हैं तो उसके साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है जैसा पुलिसवाले हिंदी फिल्मों में राजनेताओं या डान के बेटो के हत्यारों के  साथ करते हैं |ये बहुत ही शर्मिंदगी और पिछडेपन का लक्षण माना जाता हैं | अगर वो साल के बारह महीनो या हमारे पर्व-त्योहारों का सांस्कृतिक या वैज्ञानिक मतलब जानते या बतलाना चाहता हों तो सब लोग इसे बकबास या पुरानी मानसिकता या देहाती लक्षण बता कर उस बात को कोई तबज्जो ही नहीं देंगे;इसका सबसे बड़ा कारण हैं की हम में से अधिकतर को इसके बारे में कुछ मालूम ही नहीं हैं |आज हम लोग पर्व और त्योहार को खाने-पीने  और मस्ती के आयाम के रूप में देख और अपना रहें हैं | चाहे सरस्वती पूजा हों या बर्थडे या गणतंत्र दिवस पार्टी गाना और celebration तो एक ही रहता हैं |हमारी हालत धोबी के कुत्ते जैसे हो गया हैं- न तो हम लोग को अपने बारे में कुछ बता हैं और ना हीं हम पश्चिम के बारे में कुछ जान पायें हैं| बस हम और हमारा ये समाज एक दिखावा,एक ढोंग कर रहें हैं की ताकि लोग समझे की अब हम advance हों गये हैं पर वास्तव में हमें भी पता नहीं हैं की ये दिखावा क्यों और किसके लिए ?हम लोग एक मृगतृष्णा के पीछे भाग रहें हैं पर कब तक ? दोष सिर्फ नवयुवाओं का ही नहीं हैं , दोषी हमारे अभिभावक भी हैं जिन्होंने पढाई और नौकरी के सामने नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों के महत्व को भुला ही दिया हैं और जिन अभिभावकों ने इसके महत्व को समझा ,उन्होंने इसे अपने बच्चो पर थोपने का प्रयास किया |सनसनी और खबरों के पीछे भागती मीडिया ने तो चकाचौंध और उदारता को एक नया आयाम और परिभाषा दे दिया हैं |
        छूक छूक करती रेलगाड़ी का जिन्दा रहना हम लोगों को बहुत बड़ा सन्देश दे रहा हैं , अगर हमे अपने आप को सही में जिन्दा रखना हैं तो हमे अपना आप को समझना पड़ेगा , अपने परम्परा और संस्कृति को सही और सरल भाषा में आगे बढ़ाना पड़ेगा | कलाम साहब का vision २०२० का मतलब सिर्फ देश को Technology में आगे ले जाना या GDP बढ़ाना नहीं हैं बल्कि इस vision में हमारा मानसिक, नैतिक ,सामाजिक , सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विकास भी बहुत मजबूती से जुडा हुआ हैं |